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जलीकटी



गोत्र के भगवान!

(पृष्ठ 2 से आगे)

बाबा रामदेव का नाम लेना चाहूँगा इस गोत्र-विवाद सन्दर्भ में. उनको जलीकटी सुनाने की ना अपनी औकात है, ना हैसियत. छोटे-मोटे आदमी हैं हम तो. कोई योगी या योग-गुरु नहीं. इस मामले में लोगों को सही शिक्षा देना, मार्गदर्शन करना और यह खून-ख़राबा बंद करवाना क्या उनका फ़र्ज़ नहीं था? हमारी सुनता ही कौन है, उनकी तो देश के वरिष्ठ नेता तक सुनते हैं. कुछ ढंग का बोल नहीं सकते थे तो चुप ही रहते कम से कम! कम से कम 'मेडिकल साइन्स' का नाम तो ना लेते अपने 'शुभ विचारों' को तर्क-संगत साबित करने के लिए. अपनी 'मेडिकल साइन्स' की आधी-अधूरी जानकारी दिखाने की ज़रूरत क्या थी?! दे दिया ना ज़ालिमों को हत्या करने का एक और बहाना! गये ना 3 और बेक़सूर दुनिया से! बाबा जी, यह आपको मेडिकल साइन्स की दुनिया की किस किताब ने बता दिया कि एक ही गोत्र के लोग भाई-बहन होते हैं और उनको शादी नहीं करने देनी चाहिए? क्षमा कीजिएगा अगर आपके इस बयान पर मैं आपको अदालत का न्योता दिलवा दूं तो. यहाँ तक कि आपने इस सन्दर्भ में क़ानून में संशोधन तक करने की माँग कर डाली?! गावों वाले लोग तो खुद को भगवान जितनी जानकारी वाला समझने लग गये होंगे आपका ये बयान सुनकर. टेलीविज़न तो हर गाँव के हर घर में हैं. फैला दिया ना आपने अपने मानने वाले भोले-भाले गाँव वालों के दिमाग़ों में ज़हर! हम जितने उँचे स्थान पर पहुँच जाएँ, ज़िम्मेदारी उतनी ही बढ़ जाती है कुछ भी बोलने या लिखने से पहले की. सोचना पड़ता है कि हमारे इस बयान का असर क्या हो सकता है.

मेडिकल साइन्स में सिर्फ़ एक माँ-बाप की संतानों को भाई-बहन माना जाता है, उससे आगे कुछ नहीं. फर्स्ट कज़िन्स तक भाई-बहन नहीं होते. जब आप अँग्रेज़ी लिखते भी हैं तो cousin के आगे brother या sister लिखना ग़लत माना जाता है. कज़िन सिर्फ़ कज़िन ही होता है. अँग्रेज़ हमसे ज़्यादा समझदार हैं जो हर चीज़ को 'प्रॅक्टिकली' लेते हैं. कम से कम कन्फ्यूषन यानि उलझन तो नहीं रहने देते!

अगर भाई-बहन के नज़रिए से देखा जाए तो यह जज़्बा ज़बरदस्ती तो पैदा किया नहीं जा सकता. हमारे देश के चरित्र तो इतने ऊँचे रहे हैं कि कज़िन तो क्या, किसी राह चलते अजनबी से भी राखी का रिश्ता बना लिया जाता है तो वो भी सारी उम्र भाई या बहन ही रहते हैं, for every practical purpose. मगर क्या यह जज़्बा ज़बरदस्ती पैदा किया जा सकता है? जिसे देखते ही दिल बोल उठे कि हाँ, यही है मेरा जीवन साथी, जिसको देखकर कुछ मन के, या यहाँ तक की 'शरीर' के भी अरमान जाग कर खड़े हो जाए, उसके बारे में अगर ये हुक़म सुना दिया जाए की यह तुम्हारी बहन है या तुम्हारा भाई है तो क्या इंसान दिल से मान जाएगा? ये बात क्या भाई-बहन जैसे रिश्ते के लिए सही भी है? क्या ये बात इस रिश्ते की पवित्र मर्यादा को गिराने का ख़तरा नहीं है? शादी का विचार छोड़ भी दें तो मिलना तो नहीं छोड़ देंगे. नतीजा यही होगा कि 'दिन में भैया और रात में.....' शादी करना ज़्यादा अच्छा हुआ या व्यभिचार करना? ये समझदार लोग, समाज के ठेकेदार क्या इतना नहीं सोच पा रहे?

आदमी-औरत, पति-पत्नी के रिश्ते पर जो इतने बड़े-बड़े भाषण देते थे और जिनके मर्यादा वगेरह पर विचारों ने मुझे भी अपना 'फ़ैन' बना लिया था, उन बाबा रामदेव जी को राजनेताओं की तरह कुछ लोगों को खुश करने के लिए ऐसा बयान नहीं देना चाहिए था. बाबाजी, मैं तो आज के बाद आपकी कोई बात मानूँगा नहीं, मगर गाँव के लोग हो सकता है आपका नाम ले-लेकर कितने और बेक़सूरों को मौत के घाट उतारते रहेंगे. यह पाप किसके सर होगा?

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